245. स्वतंत्रता दिवस- कविता पढ़िए
गूंजी थी सन् 47 में
जय हिन्द की जय- जय वाणी
बन्धनमुक्त हुई थी, प्रिय जननी
सत्य जनों की खानी
आज सुनहरा फिर से
वो दिन है आया
तरंगों से ऊपर उठ कर
खुशियों का सागर लहराया
[2]
लाल किले पर यही दिन था
जवाहर ने तिरंगा लहराया था
ऊंचे स्वर में सूर्य-सुता-
यमुना जी ने
वन्दे भारत गाया था
[3]
इसी लाल किले से हर वर्ष
प्रधानमन्त्री---
आज भी तिरंगा लहराते हैं
आजादी के पावन पर्व की
पवित्र परम्परा निभाते हैं
अति उत्साह, उमंग के साथ
'जय हिन्द' का नारा लगाते हैं
[4]
शहीदों के बलिदानों को वे
अपना शीश झुकाते हैं
"आदर करो पूर्वजों का"
बच्चों को "संदेश" देते हैं
[5]
पल भर में हम मुंह चला कर
जिनका निरादर करते हैं
पड़ जाए सींचना गर एक वृक्ष को
तो ज़र-ज़र पसीने झड़ते हैं
[6]
जो पूर्वजों का आदर कर न सके
आज़ाद रहने का उसे अधिकार नहीं
जो सींच न सके फलधारी वृक्ष को
छाया का भी उसे अधिकार नहीं
[7]
रहे हैं वृक्ष परोपकारी सदा
वे फल खाने से रोकते नहीं
इसीलिए, याद रहे--
निरादर करने वाले
कुदरत की मार से कभी बचते नहीं
[8]
आदर करो उन पूर्वजों का
आज़ादी का जिन्होंने बिगुल बजाया था
बुलन्द की आवाज़ जिन्होंन
प्राणों को आग में झोंका था
आदर करो उन माताओं का
जिन्होंने बेटों को कुर्बान किया
आदर करो उन सुहागनों का
सुहाग जिन्होंने दान दिया।
अकारथ है जन्म उनका
जो लाल लहू को
'भीख' का दर्जा देते हैं
अक्ल के अंधे पारसमणि को
टूटा कांच समझते हैं
खुली हवा में सांस ले कर भी
ईर्ष्या की घुटन में जीते हैं।
================================================================जयहिन्द! जय भारत!
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लेखिका-निरुपमा गर्ग
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