244. बहुत खूब [ लघु कविता] पढ़िए


 


     [1]
ज़िन्दगी खूबसूरत है, लेकिन
क्या आता है तुमको जीना?
लहर,लहर लहराती दरिया
क्या आता है तुमको इसमें तैरना?
    [2]
था  फूल सा तुम्हारा बाल्यकाल
 खिलखिलाता सा था तुम्हारा बाग
पर तुम रोए,खूब रोए
क्या आता है कभी तुम्हें मलाल ?
    [3]
पहुंचे किशोरावस्था में तुम
थी पढ्ने-लिखने की उम्र तुम्हारी
होनी थी मेहनत में लग्न तुम्हारी
क्या तुम "ये  सब ये कर पाए ?
 समय का सदुपयोग क्या कर पाए ?
   [4] 
कुछ उम्र बीती खेल-कूद में
कुछ बीती पढ्ने में
बाकी बीती झगड़े में
बिन बात के गुस्से में
अगणित गिले-शिकवों में
बीत गई जब ज़िन्दगानी
तो बीते दिन पछतावों में
 कभी सुकून से जी न पाए
 चैन से रैन बिता न पाए 
   [5]
जब हंसना था तो रोए खूब
जब पढ़ना था तो घूमे खूब
जब था मेहनत करना
मौज उड़ाई खूब
 गृहस्थी चलानी थी प्रेम से जब
बेबाक किए झगड़े खूब 
थी ज़िंदगी  खूबसूरत
स्वर्ग सा  इसे बनाना था
पर अपने ही हाथों 
इसे नरक बनाया खूब 
कर्म किए खुद उल्टे-सीधे
दिया कभी दोष ईश्वर को 
कभी अपनों को
कभी बेगानों को खूब 
वाह रे इंसान! बहुत खूब
बहुत खूब ॥

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                                                                                          लेखिका: निरुपमा गर्ग
                                                                                     

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