198 कविता नं 4- हिन्दी बनाम अंग्रेज़ी-एक हास्य कविता पढ़िए
संस्कृत से मैं जन्मी हूं
लिखे संस्कृत में वेद,ग्रंथ
उन्हें परिभाषित करती हूं
[2]
मुझ हिन्दी का अस्तित्व है अपना
ध्वनि अपनी मैं लाई हूं
आदिकाल के सुर हैं मेरे
अपनी साख स्वयं बनाई हूं
[ 3]
अंग्रेज़ी तो है उधार की भाषा
इसने-
पुर्तगाल, फ्रांस, जर्मनी, जाने
कहां कहां से शब्द बटोरे हैं
स्वरों के भी उच्चारण, शायद
अमेरिका,ब्रिटेन से उधारे हैं
तभी तो B. U. T.- but
P.,U., T- put
उल्टे-पुल्टे उच्चारे हैं
[4]
कभी 'U' को 'उ'
कभी 'U' को अ
कभी E को ऐ,
कभी E को इ
स्वर कितने हैं पता नहीं
कभी 'Ch' को क,
कभी Ch को च
कभी Ch को श
है व्यंजनों का भी हाल यही
[5]
अपनी हिन्दी तो है भाषा सरल,
नमस्ते, अभिवादन करती है
इसकी यही सरल सादगी
सबका दिल जीतती है
[6]
दूसरी ओर अंग्रेज़ी-
खुद तो कन्फ्यूज़ रहती है
औरों को भी कन्फ्यूज़ करती है
सुबह 'गुड मार्निंग,
दोपहर 'गुड नून'
शाम को 'गुड इवनिंग
'अभिवादन' तरह-तरह के करती है
[7]
कभी-कभी तो अज्ञानी जनों से
समय पर कुछ का कुछ बुलवाती है
बोल बैठते हैं वे अज्ञानी-
Sister को his, और brother को her
'गुड नून' के स्थान पर 'गुड इवनिंग
और 'गुड इवनिंग' के स्थान पर 'गुड नून'
सबको हंसता देख आखिर में
हिन्दी का सहारा लेते मासूम
[6]
अपनी 'हिन्दी' सबसे अच्छी
क्या आवश्यकता है
'हेर-फेर की' अंग्रेज़ी को?
सीधा गुड टाइम' बोल दे जो
बेकार के चक्कर 'छोड़-छाड़ के
हिन्दी से 'प्रणाम' उधार ले ले जो
हिन्दी से 'प्रणाम' उधार ले ले जो ॥
धन्यवाद!
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लेखिका-निरुपमा गर्ग
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