श्री रामचरितमानस-उत्तरकाण्ड-सातवां सोपान
काकभुसुण्डि एक चिरंजीवी ऋषि हैं जो कौवे के रूप में अमर हो गए, और गरुड़, पक्षियों के राजा, को रामचरितमानस की कथा सुनाते हैं। काकभुसुण्डि को लोमश ऋषि के श्राप के कारण कौवा बनना पड़ा, लेकिन राम मंत्र और इच्छामृत्यु के वरदान से वे अमर हो गए और भगवान राम के परम भक्त बने। गरुड़ के मन में राम के भगवान होने का संदेह था, जिसे काकभुसुण्डि ने रामकथा सुनाकर दूर किया।
* मानस रोग कहहु समुझाई। तुम्ह सर्बग्य कृपा अधिकाई॥
तात सुनहु सादर अति प्रीती। मैं संछेप
कहउँ यह नीती॥4॥
भावार्थ:- गरुड जी बोले- हे :-पक्षी श्रेष्ठ ! मानस रोगों को समझाकर कहिए। आप सर्वज्ञ हैं और मुझ पर आपकी कृपा भी बहुत है।
काकभुशुण्डिजी ने कहा- हे तात अत्यंत आदर और प्रेम के साथ सुनिए। मैं यह नीति संक्षेप से कहता हूँ॥
1.शंकरजी और गुरु की निंदा करने वाला मनुष्य (अगले जन्म में) मेंढक होता है और वह हजार जन्म तक वही मेंढक का शरीर पाता है।
2.ब्राह्मणों की निंदा करने वाला व्यक्ति बहुत से नरक भोगकर फिर जगत् में कौए का शरीर धारण करके जन्म लेता है॥
3.जो अभिमानी जीव देवताओं और वेदों की निंदा करते हैं, वे रौरव नरक में पड़ते हैं
4.संतों की निंदा में लगे हुए लोग उल्लू होते हैं, जिन्हें मोह रूपी रात्रि प्रिय होती है और ज्ञान रूपी सूर्य जिनके लिए बीत गया (अस्त हो गया) रहता है॥
5.जो मूर्ख मनुष्य सब की निंदा करते हैं, वे चमगादड़ होकर जन्म लेते हैं।
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अब सुनिए सबसे अधिक भाग्यशाली कौन है?-
1.वह देश धन्य है, जहाँ श्री गंगाजी हैं ।
2.वह स्त्री धन्य है जो पातिव्रत धर्म का पालन करती है।
3.वह राजा धन्य है जो न्याय करता है ।
4. वह ब्राह्मण धन्य है जो अपने धर्म से नहीं डिगता है॥
5.वह धन धन्य है, जिसकी पहली गति होती है (जो दान देने में व्यय होता है)
6. वही बुद्धि धन्य और परिपक्व है जो पुण्य में लगी हुई है।
7. वही घड़ी धन्य है जब सत्संग हो ।
8. वही जन्म धन्य है जिसमें ब्राह्मण की अखण्ड भक्ति हो ।
9.वह कुल धन्य है, संसारभर के लिए पूज्य है और परम पवित्र है, जिसमें श्री रघुवीर परायण (अनन्य रामभक्त) विनम्र पुरुष उत्पन्न हों॥
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