श्री रामचरितमानस-उत्तरकाण्ड-सातवां सोपान


 

काकभुसुण्डि एक चिरंजीवी ऋषि हैं जो कौवे के रूप में अमर हो गए, और गरुड़, पक्षियों के राजा, को रामचरितमानस की कथा सुनाते हैं। काकभुसुण्डि को लोमश ऋषि के श्राप के कारण कौवा बनना पड़ा, लेकिन राम मंत्र और इच्छामृत्यु के वरदान से वे अमर हो गए और भगवान राम के परम भक्त बने। गरुड़ के मन में राम के भगवान होने का संदेह था, जिसे काकभुसुण्डि ने रामकथा सुनाकर दूर किया। 

  प्र.1              * प्रथमहिं कहहु नाथ मतिधीरा। सब ते दुर्लभ कवन सरीरा॥

बड़ दुख कवन कवन सुख भारी। सोउ संछेपहिं कहहु बिचारी॥2॥
भावार्थ:-हे नाथ! हे धीर बुद्धि! पहले तो यह बताइए कि सबसे दुर्लभ कौन सा शरीर है फिर सबसे बड़ा दुःख कौन है और सबसे बड़ा सुख कौन है, यह भी विचार कर संक्षेप में ही कहिए॥

काकभुशुण्डिजी ने कहा- हे तात अत्यंत आदर और प्रेम के साथ सुनिए। मैं यह नीति संक्षेप से कहता हूँ॥

*नर तन सम नहिं कवनिउ देही।

मनुष्य शरीर के समान कोई शरीर नहीं है। चर-अचर सभी जीव उसकी याचना करते हैं। वह मनुष्य शरीर नरक, स्वर्ग और मोक्ष की सीढ़ी है तथा कल्याणकारी ज्ञान, वैराग्य और भक्ति को देने वाला है |

अत:

 सो तनु धरि हरि भजहिं न जे नर। होहिं बिषय रत मंद मंद तर॥
काँच किरिच बदलें ते लेहीं। कर ते डारि परस मनि देहीं॥6॥
भावार्थ:-ऐसे मनुष्य शरीर को धारण (प्राप्त) करके भी जो लोग श्री हरि का भजन नहीं करते और नीच से भी नीच विषयों में अनुरक्त रहते हैं, वे पारसमणि को हाथ से फेंक देते हैं और बदले में काँच के टुकड़े ले लेते हैं॥
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प्र.2 निंदा करने वाला मनुष्य कौन सा दण्ड भोगता है ?

1.शंकरजी और गुरु की निंदा करने वाला मनुष्य (अगले जन्म में) मेंढक होता है और वह हजार जन्म तक वही मेंढक का शरीर पाता है। 

2.ब्राह्मणों की निंदा करने वाला व्यक्ति बहुत से नरक भोगकर फिर जगत्‌ में कौए का शरीर धारण करके जन्म लेता है॥

3.जो अभिमानी जीव देवताओं और वेदों की निंदा करते हैं, वे रौरव नरक में पड़ते हैं

4.संतों की निंदा में लगे हुए लोग उल्लू होते हैं, जिन्हें मोह रूपी रात्रि प्रिय होती है और ज्ञान रूपी सूर्य जिनके लिए बीत गया (अस्त हो गया) रहता है॥

5.जो मूर्ख मनुष्य सब की निंदा करते हैं, वे चमगादड़ होकर जन्म लेते हैं।

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प्र.3 इस संसार में सबसे अधिक भाग्यशाली  कौन  है?-

1.वह देश धन्य है, जहाँ श्री गंगाजी हैं ।

2.वह स्त्री धन्य है जो पातिव्रत धर्म का पालन करती है। 

3.वह राजा धन्य है जो न्याय करता है ।

4. वह ब्राह्मण धन्य है जो अपने धर्म से नहीं डिगता है॥

5.वह धन धन्य है, जिसकी पहली गति होती है (जो दान देने में व्यय होता है)

6. वही बुद्धि धन्य और परिपक्व है जो पुण्य में लगी हुई है।

7. वही घड़ी धन्य है जब सत्संग हो ।

8. वही जन्म धन्य है जिसमें ब्राह्मण की अखण्ड भक्ति हो ।

9.वह कुल धन्य है, संसारभर के लिए पूज्य है और परम पवित्र है, जिसमें श्री रघुवीर परायण (अनन्य रामभक्त) विनम्र पुरुष उत्पन्न हों॥

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प्र. 4-  इस संसार में सबसे  बडा  दु:ख कौन सा  है ?

उ.-  दरिद्रता

प्र. 5-  इस संसार में सबसे  बडा  सुख कौन सा  है ?

उ.-   शिष्टाचारी  संतों का मिलन

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प्र. 6.  इंसान दु:ख क्यों  भोगता  है ?

उ.  इंसान के दु: ख का मूल  कारण उसका  मोह  है । मोह  के  कारण वह यह सोचने लगता है कि "सब कुछ मेरा है । मैं ही  खाऊं, मैं ही पहनूं, मैं ही ऐश करूं । उसके सामने यदि कोई दूसरा सुखी होतो वह दुखी हो  जाता है । यही मोह  उसे " काम,क्रोध,लोभ की  प्राण-घातक बीमारियां लगा देता  है । यूं समझ लो-

काम (वासना) ---- 'वात' (वायु), का  रोग  है ।

लोभ (अत्यधिक लालच)----- 'कफ' (कफ दोष) है ।

और क्रोध------ 'पित्त' (पित्त दोष) के समान हैं  ।

ये  तीनों रोग हमेशा छाती (मन/शरीर) को जलाते रहते हैं.। 

  • अहंकार अति दुखद डमरुआ: अहंकार (घमंड) गांठ या गठिया जैसा अत्यंत दुख देने वाला रोग है, जो शरीर को अंदर से खोखला कर देता है (डमरुआ - गाँठ)।
  • दंभ कपट मद मान नेहरुआ: दंभ (पाखंड), कपट (धोखा), मद (नशा/घमंड) और मान (अभिमान) नसों का रोग (नहरुआ - नसों की पीड़ा) हैं।
  • तृस्ना उदरबृद्धि अति भारी: तृष्णा (लालसा, लोभ) पेट को फुलाने वाला (जलोदर) जैसा भारी रोग है।
  • त्रिबिध ईषना तरुन तिजारी: तीन प्रकार की इच्छाएँ (पुत्र, धन और मान की इच्छा) प्रबल ज्वर (तिजारी) के समान हैं जो शरीर को जला देती हैं।
  • जुग बिधि ज्वर मत्सर अबिबेका: दो तरह के ज्वर (राग-द्वेष) और विवेकहीनता (अविवेक) हैं।
  • कहँ लागि कहौं कुरोग अनेका: ऐसे न जाने कितने और भी भयानक रोग हैं, जिनका वर्णन क्या किया जाए। 

इन मन  के रोगों  के  इलावा मनुष्य अनेक शारीरिक रोगों से घिरा रहता है ।  इसलिए मनुष्य दु:खी रहता है ।

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