237. ===== Teachings of अरण्यकाण्ड+किष्किन्धा काण्ड { Hindi/Eng }====




=Aranyakand=

*मित्र करइ सत रिपु कै करनी। ता कहँ बिबुधनदी बैतरनी॥
सब जगु ताहि अनलहु ते ताता। जो रघुबीर बिमुख सुनु भ्राता॥4॥
भावार्थ : जब इंद्रपुत्र जयन्त सीता जी के पांव में चोंच मार कर भागा तो श्री राम का बाण उसके पीछे लग गया । उसने अपने पिता, व सब देवों को सहायता के लिए पुकारा परन्तु किसी ने उसकी सहायता न की ।तब भगवान शंकर ने पार्वती से कहा-
            मित्र सैकड़ों शत्रुओं की सी करनी करने लगता है। देवनदी गंगाजी उसके लिए वैतरणी (यमपुरी की नदी) हो जाती है। हे भाई! सुनिए, जो श्री रघुनाथजी के विमुख होता है, समस्त जगत उनके लिए अग्नि से भी अधिक गरम (जलाने वाला) हो जाता है॥4॥
English- Lord Shiva said to Goddess Parvati, "one who is detached from Lord Rama, his  friends start acting like a hundred enemies, the celestial river Ganga becomes the river Vaitarni, and the whole world becomes hotter than fire for him."
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* धीरज धर्म मित्र अरु नारी। आपद काल परिखिअहिं चारी॥
भावार्थ : माता अनुसुइया ने  सीता जी को पतिव्रत धर्म समझाते हुए कहा-धैर्य, धर्म, मित्र और स्त्री- इन चारों की विपत्ति के समय ही परीक्षा होती है।
English- Mata Anusuiya, the wife of Rishi Atri said to Mata Sita, "Patience, righteousness, friendship, and wife—these four are tested only in times of calamity.
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* नवनि नीच कै अति दुखदाई। जिमि अंकुस धनु उरग बिलाई॥
भयदायक खल कै प्रिय बानी। जिमि अकाल के कुसुम भवानी॥4॥
भावार्थ : अहंकारी रावण जो किसी के आगे नहीं झुकता था,मारीच के सामने झुक कर उसे हिरण बनने के लिए मनाने लगा । भगवान शिव पार्वती से बोले-
 नीच का झुकना (नम्रता) भी अत्यन्त दुःखदायी होता है। जैसे अंकुश, धनुष, साँप और बिल्ली का झुकना। हे भवानी! दुष्ट की मीठी वाणी भी (उसी प्रकार) भय देने वाली होती है, जैसे बिना ऋतु के फूल!॥4॥
English: Ravana went to Mareech to disguise as a golden deer and bowed down before him. At this Shiva said to Parvati, The meakness of a mean creature is a source of great trouble, like the bending of a goad, bow, snake, or cat. The friendly speech of a villain is as dangerous as the flowers that blossom out of season.
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* परहित बस जिन्ह के मन माहीं। तिन्ह कहुँ जग दुर्लभ कछु नाहीं॥
तनु तिज तात जाहु मम धामा। देउँ काह तुम्ह पूरनकामा॥5॥
भावार्थ : श्री राम ने जटायु से कहा-जिनके मन में दूसरे का हित बसता है (समाया रहता है), उनके लिए जगत्‌ में कुछ भी (कोई भी गति) दुर्लभ नहीं है। हे तात! शरीर छोड़कर आप मेरे परम धाम में जाइए। मैं आपको क्या दूँ? आप तो पूर्णकाम हैं (सब कुछ पा चुके हैं)॥5॥
English: Rama said to Jatayu,"Those who sacrifices for the welfare of others, for them nothing is unattainable  in this world. Rama touching Jatayu with gentle caress said, " O beloved, leaving your body go to my supreme abode. What can I give you, you are, already, complete in yourself."
Message: He who sacrifices for others enjoys the bliss of God.
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* मन क्रम बचन कपट तजि जो कर भूसुर सेव।
मोहि समेत बिरंचि सिव बस ताकें सब देव॥33॥
भावार्थ : अगस्त्य मुनि के कहने पर भगवान श्री राम ने ब्राह्मणों के सम्मान की महत्ता बताते हुए कहा- मन, वचन और कर्म से कपट छोड़कर जो भूदेव ब्राह्मणों की सेवा करता है, मुझ समेत ब्रह्मा, शिव आदि सब देवता उसके वश हो जाते हैं॥33॥
English: Rama said,"He who serves the Brahmins by thought, word and action without deceit, all the gods Brahma, Lord Shiva, and me{Rama} are under his control."
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* तात तीनि अति प्रबल खल काम क्रोध अरु लोभ।
मुनि बिग्यान धाम मन करहिं निमिष महुँ छोभ॥38 क॥
भावार्थ :  श्री राम ने  लक्ष्मण से कहा- हे तात! काम, क्रोध और लोभ- ये तीन अत्यंत दुष्ट हैं। ये विज्ञान के धाम मुनियों के भी मनों को पलभर में क्षुब्ध कर देते हैं॥
English: Rama said to Laxmana," Lust, greed and anger"-these three things are extremely wicked enemies. They are able to agitate the minds of sages even in a second.
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* करउँ सदा तिन्ह कै रखवारी। जिमि बालक राखइ महतारी॥
गह सिसु बच्छ अनल अहि धाई। तहँ राखइ जननी अरगाई॥3॥
भावार्थ : जब नारद ने भगवान राम से पूछा कि उन्होंने नारद को विवाह क्यूं नहीं करने दिया? तो उन्होंने उत्तर दिया कि अभी तुम बिल्कुल स्वतंत्र हो इसलिए ईश्वर ध्यान के  कारण जन्म-मरण से मुक्त हो । विवाह कर लेते तो तुम काम,क्रोध,लोभ,मोह में फंस जाते । मैं तुम्हारी रक्षा करना चाहता था । हे नारद!
 मैं सदा अपने भक्तों की वैसे ही रखवाली करता हूँ, जैसे माता बालक की रक्षा करती है। छोटा बच्चा जब दौड़कर आग और साँप को पकड़ने जाता है, तो वहाँ माता उसे (अपने हाथों) अलग करके बचा लेती है॥3॥
English: Rama said to Narada, " I always protect my devotees in the same way as a mother protects her child. When a small child rushes towards a fire/snake, their mothers take them away and save them.
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|| किष्किंधाकाण्ड ||

* जे न मित्र दुख होहिं दुखारी। तिन्हहि बिलोकत पातक भारी॥
निज दुख गिरि सम रज करि जाना। मित्रक दुख रज मेरु समाना॥1॥
भावार्थ : श्री राम ने सुग्रीव से कहा- जो लोग मित्र के दुःख से दुःखी नहीं होते, उन्हें देखने से ही बड़ा पाप लगता है। 
अपने पर्वत के समान दुःख को धूल के समान और मित्र के धूल के समान दुःख को सुमेरु (बड़े भारी पर्वत) के समान जाने॥1॥
English: Rama said to Sugriva, "Those who do not feel their friend's sorrow as their own, seeing them brings great sin"
Message: "Treat your own mountain-like sorrows as mere dust, and consider a friend's dust-like sorrows as great as Mount Sumeru.
* जिन्ह कें असि मति सहज न आई। ते सठ कत हठि करत मिताई॥
कुपथ निवारि सुपंथ चलावा। गुन प्रगटै अवगुनन्हि दुरावा॥2॥
भावार्थ : श्री राम ने  कहा- जिन्हें स्वभाव से ही ऐसी बुद्धि प्राप्त नहीं है, वे मूर्ख हठ करके क्यों किसी से मित्रता करते हैं? मित्र का धर्म है कि वह मित्र को बुरे मार्ग से रोककर अच्छे मार्ग पर चलावे। उसके गुण प्रकट करे और अवगुणों को छिपावे॥2॥
English: Laxmna said to Sugriva on behalf of Rama,"Those who do not possess such wisdom, why do those fools stubbornaly form friendships? A friend's duty is to keep the friend away from the wrong path and make them follow the right path, reveal their virtues and hide their faults."
* देत लेत मन संक न धरई। बल अनुमान सदा हित करई॥
बिपति काल कर सतगुन नेहा। श्रुति कह संत मित्र गुन एहा॥3॥
भावार्थ : श्री राम ने सुग्रीव से कहा- कि एक सच्चा मित्र वही है जो देने-लेने में मन में शंका न रखे। अपने बल के अनुसार सदा हित ही करता रहे। विपत्ति के समय तो सदा सौगुना स्नेह करे। वेद कहते हैं कि संत (श्रेष्ठ) मित्र के गुण (लक्षण) ये हैं॥3॥
English: Rama said to Sugriva," A true friend should never have doubts in giving or receiving and always acts for the welfare of his friend according to his ability, and offer a hundred times more support in times of adversity. The Vedas regard these qualities as the attributes of a saintly friend."
* आगें कह मृदु बचन बनाई। पाछें अनहित मन कुटिलाई॥
जाकर ‍िचत अहि गति सम भाई। अस कुमित्र परिहरेहिं भलाई॥4॥
भावार्थ : जो मित्र सामने तो बना-बनाकर कोमल वचन कहता है और पीठ-पीछे बुराई करता है तथा मन में कुटिलता रखता है- हे भाई! (इस तरह) जिसका मन साँप की चाल के समान टेढ़ा है, ऐसे कुमित्र को तो त्यागने में ही भलाई है॥4॥
English: Rama said to Laxmna,"One who speaks softly and sweetly to your face but harbours malicious intent and deceit behind your back, whose heart is crooked like the movement of a snake- brother, it is best to abandon such a friend."
* सेवक सठ नृप कृपन कुनारी। कपटी मित्र सूल सम चारी॥
सखा सोच त्यागहु बल मोरें। सब बिधि घटब काज मैं तोरें॥5॥
भावार्थ : श्री  राम ने सुग्रीव से कहा- मूर्ख सेवक, कंजूस राजा, कुलटा स्त्री और कपटी मित्र- ये चारों शूल के समान पीड़ा देने वाले हैं। हे सखा! मेरे बल पर अब तुम चिंता छोड़ दो। मैं सब प्रकार से तुम्हारे काम आऊँगा (तुम्हारी सहायता करूँगा)॥5॥
English: Rama said to Sugriva,"A foolish servant, a miserly king, unchaste wife, and a cunning friend are as painful as spear. Rama said to Sugriv, " Dear friend ! shed all your worries, and on my strength, I will assist you in every way."











 

उठो देव बैठो देव भजन -


उठो देव बैठो देव - पाटकली चटकाओ देव
आषाढ़ में सोए देव - कार्तिक में जागे देव
कोरा कलशा मीठा पानी - उठो देव पियो पानी    
हाथ पैर फटकारो देव - आंगुलियां चटकाओ देव
कुवारों के ब्याह कराओ देव-ब्याह के गौने कराओ देव
तुम पर फूल चढ़ाए देव-घी का दीया जलाये देव
आओ देव पधारो देव-तुमको हम मनाएं देव
चूल्हा पीछे पांच पछीटा- सासू जी बलदाऊ तुम्हारे बेटा 

ओने कोने झांझ मंजीरा - सहोदर किशन जी तुम्हारे वीरा
ओने कोने रखे अनार ये है किशन जी तुम्हारे यार
ओने कोने लटकी चाबी सहोदरा ये है तुम्हारी भाभी
जितनी खूंटी टांगो सूट - उतने इस घर जन्मे पूत

जितनी इस घर सीक सलाई-उतनी इस घर बहुएं आईं

जितनी इस घर ईंट और रोडे उत‌ने इस घर हाथी-घोड़े

गन्ने का भोग लगाओ देव

 सिंघाड़े का भोग लगाओ देव
बेर का भोग लगाओ देव 

गाजर का भोग लगाओ देव
गाजर का भोग लगाओं देव

सेंगरी,पूए  का भोग लगाओ देव
उठो देव उठो

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                                         विष्णु सहस्रनाम (संस्कृत) एवं हिंदी में व्याख्या

नीचे श्री विष्णु सहस्रनाम के कुछ मुख्य श्लोक संस्कृत में दिए गए हैं, जिनका हर नाम का संक्षिप्त हिंदी अर्थ भी बताया गया है:
संस्कृत:
विश्वं विष्णु: वषट्कारो भूत-भव्य-भवत-प्रभुः ।
भूत-कृत भूत-भृत भावो भूतात्मा भूतभावन: ।। 1 ।।
हिंदी अर्थ:
विश्वं: जो सम्पूर्ण जगत् है
विष्णु: सबको व्याप्त करने वाला
वषट्कार: यज्ञ के वषट्कार मन्त्रस्वरूप
भूत-भव्य-भवत-प्रभु: जो भूत (अतीत), भव्य (भविष्य) और भव (वर्तमान) के प्रभु हैं
भूत-कृत: समस्त भूतों का निर्माण करने वाला
भूत-भृत: सबका पालन करने वाला
भाव: स्वरूप
भूतात्मा: सभी जीवों की आत्मा
भूतभावन: जीवों का पालन करने वाला
पूतात्मा परमात्मा च मुक्तानां परमं गतिः।
अव्ययः पुरुष साक्षी क्षेत्रज्ञो अक्षर एव च ।। 2 ।।
हिंदी अर्थ:
पूतात्मा: पवित्रात्मा
परमात्मा: सभी आत्माओं का परम तत्व
मुक्तानां परमं गतिः: मुक्त जीवों की परम गति
अव्ययः: अविनाशी
पुरुष: सभी प्राणियों का आधार
साक्षी: सबका साक्षी
क्षेत्रज्ञः: शरीर रुप क्षेत्र का ज्ञाता
अक्षरः: जो कभी नष्ट न हो
योगो योग-विदां नेता प्रधान-पुरुषेश्वरः ।
नारसिंह-वपुः श्रीमान केशवः पुरुषोत्तमः ।। 3 ।।
हिंदी अर्थ:
योग: योग स्वरूप
योग-विदां नेता: योग जानने वालों के स्वामी
प्रधान-पुरुषेश्वर: प्रधान व पुरुष के ईश्वर
नरसिंह-वपु: नरसिंह रूपधारी
श्रीमान: लक्ष्मीपति
केशवः: दिव्य केश वाले
पुरुषोत्तमः: श्रेष्ठ पुरुष
सर्वः शर्वः शिवः स्थाणु: भूतादि: निधि: अव्ययः ।
सम्भवो भावनो भर्ता प्रभवः प्रभु: ईश्वरः ।। 4 ।।
हिंदी अर्थ:
सर्वः: सब
शर्वः: शुभकारी
शिवः: कल्याण स्वरूप
स्थाणु: अचल
भूतादि: सभी जीवों का आदि
निधि: धन स्वरूप
अव्ययः: नित्य
सम्भवो: उत्पन्न होने वाला
भावनो: सभी का पालनकर्ता
भर्ता: सबका रक्षक
प्रभवः: जगत की उत्पत्ति
प्रभु: सबका स्वामी
ईश्वर: सर्वशक्तिमान
यह प्रक्रिया 1000 नामों तक चलती है, हर नाम भगवान विष्णु के किसी गुण, स्वरूप या कार्य को दर्शाता है। प्रत्येक नाम का जप करने से भक्त को आयु, विद्या, यश, स्वास्थ्य, समृद्धि, और सुख-शांति की प्राप्ति होती है.
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