235. =======श्री रामचरितमानस-लंकाकाण्ड शिक्षाएं [ Teachings] Hindi/ English ======

 


* नाथ बयरु कीजे ताही सों। बुधि बल सकिअ जीति जाही सों॥

भावार्थ : हे नाथ! वैर उसी के साथ करना चाहिए, जिससे बुद्धि और बल के द्वारा जीत सकें। 

English: Mandodry, the wife of Ravana, said," My Lord, Enmity should be made only with one whom you can defeat with wisdom and strength.

-----------------------------------------------------------------------------------

* संत कहहिं असि नीति दसानन। चौथेंपन जाइहि नृप कानन॥
तासु भजनु कीजिअ तहँ भर्ता। जो कर्ता पालक संहर्ता॥2॥
भावार्थ : मंदोदरी ने रावण को समझाते हुए कहा-हे दशमुख! संतजन ऐसी नीति कहते हैं कि चौथेपन (बुढ़ापे) में राजा को वन में चला जाना चाहिए। हे स्वामी! वहाँ (वन में) आप उनका भजन कीजिए जो सृष्टि के रचने वाले, पालने वाले और संहार करने वाले हैं॥2॥
English: Mandodari said to Ravana, "The sages and saints say, " O ten-headed one, in the fourth stage of life, a king should retire to the forest. There you should worship Him who is the creator, sustainer, and destroyer."
* बचन परम हित सुनत कठोरे। सुनहिं जे कहहिं ते नर प्रभु थोरे॥
प्रथम बसीठ पठउ सुनु नीती। सीता देइ करहु पुनि प्रीती॥5॥
भावार्थ : (रावण का पुत्र) प्रहस्त हाथ जोड़कर कहने लगा- हे प्रभो! सुनने में कठोर परन्तु (परिणाम में) परम हितकारी वचन जो सुनते और कहतेहैं,वे मनुष्य बहुत ही थोड़े हैं। नीति सुनिये, (उसके अनुसार) पहले दूत भेजिये, और (फिर) सीता को देकर श्रीरामजी से प्रीति (मेल) कर लीजिये॥5॥
English: Prahasta, the son of Ravana said,"Lord! rare are such people who listen to and speak words that are hard to hear but are extremely beneficial.Listen to my advice:send an envoy first, and then make peace with Shree Ram by returning Sita.
* हित मत तोहि न लागत कैसें। काल बिबस कहुँ भेषज जैसें॥
जब रावण ने उसकी एक न सुनी तो वह[प्रहस्त] क्रोधित हो कर बोला- हित की सलाह आपको कैसे नहीं लगती (आप पर कैसे असर नहीं करती), जैसे मृत्यु के वश हुए (रोगी) को दवा नहीं लगती।
English- Prahasta angrily spoke to Ravana," Why do the words of good counsel appeal to you, just as medicine fails to work for one who is doomed to die.
--------------------------------------------------------------------------------------------------- 
* फूलइ फरइ न बेत जदपि सुधा बरषहिं जलद।
मूरुख हृदयँ न चेत जौं गुर मिलहिं बिरंचि सम॥16 ख॥
भावार्थ : यद्यपि बादल अमृत सा जल बरसाते हैं तो भी बेत फूलता-फलता नहीं। इसी प्रकार चाहे ब्रह्मा के समान भी ज्ञानी गुरु मिलें, तो भी मूर्ख के हृदय में चेत (ज्ञान) नहीं होता॥16 (ख)॥
English: Just as the cane plant does not blossom or bear fruit even if the clouds pour nectar, similarly the heart of fool does not gain does not gain wisdom even if they get a guru equal to Lord Brahma.
-------------------------------------------------------------------------------------------------------
कौल कामबस कृपिन बिमूढ़ा। अति दरिद्र अजसी अति बूढ़ा॥1॥
* सदा रोगबस संतत क्रोधी। बिष्नु बिमुख श्रुति संत बिरोधी॥
तनु पोषक निंदक अघ खानी जीवत सव सम चौदह प्रानी॥2॥
भावार्थ:-
वाममार्गी, कामी, कंजूस, अत्यंत मूढ़, अति दरिद्र, बदनाम, बहुत बूढ़ा,
नित्य का रोगी, निरंतर क्रोधयुक्त रहने वाला, भगवान्‌ विष्णु से विमुख, वेद और संतों का विरोधी, अपना ही शरीर पोषण करने वाला, पराई निंदा करने वाला और पाप की खान (महान्‌ पापी)- ये चौदह प्राणी जीते ही मुरदे के समान हैं॥2॥
English: Angad the son of Bali said, "Lustful,Miserly,Extremely foolish,Extremely poor,Defamed,Very old,constantly ill,perpetually angry,turned away from Lord Vishnu,opposed to the vedas and saints,selfish,engages in the slander of others,and a great sinner-such 14 kinds of beings are considered as living corpses."
---------------------------------------------------------------------------------------------------
* काल दंड गहि काहु न मारा। हरइ धर्म बल बुद्धि बिचारा॥
निकट काल जेहि आवत साईं। तेहि भ्रम होइ तुम्हारिहि नाईं॥4॥
भावार्थ:- रावण की पत्नी मंदोदरी पति को समझाते हुए बोली- काल दण्ड (लाठी) लेकर किसी को नहीं मारता। वह धर्म, बल, बुद्धि और विचार को हर लेता है। हे स्वामी! जिसका काल (मरण समय) निकट आ जाता है, उसे आप ही की तरह भ्रम हो जाता है॥4॥
English: Mandodri said to Ravana, "Death does not kill anyone with a stick; it robs one of righteousness, strength, wisdom, and judgment. When the time of death is near, one becomes confused, as you are."
---------------------------------------------------------------------------------------------------------
* सुत बित नारि भवन परिवारा। होहिं जाहिं जग बारहिं बारा॥
अस बिचारि जियँ जागहु ताता। मिलइ न जगत सहोदर भ्राता॥4॥
भावार्थ:- जब रावणपुत्र मेघनाद ने लक्ष्मणजी की छाती में वीरघातिनी शक्ति चलाई तो वे  मूर्छित हो गए । यह देख कर  श्री राम को बहुत दु:ख हुआ । वे बोले-
  "पुत्र, धन, स्त्री, घर और परिवार- ये जगत्‌ में बार-बार होते और जाते हैं, परन्तु जगत्‌ में सहोदर भाई जो अपने भाई के दु:ख में बराबर खडा रहे,बार-बार नहीं मिलता।" हृदय में ऐसा विचार कर हे तात! जागो॥4॥
-------------------------------------------------------------------------------------------------------
* भजि रघुपति करु हित आपना। छाँड़हु नाथ मृषा जल्पना॥
नील कंज तनु सुंदर स्यामा। हृदयँ राखु लोचनाभिरामा॥3॥
भावार्थ:- कालनेमि राक्षस ने रावण को सलाह दी कि श्री रघुनाथजी का भजन करके तुम अपना कल्याण करो! हे नाथ! झूठी बकवाद छोड़ दो। नेत्रों को आनंद देने वाले नीलकमल के समान सुंदर श्याम शरीर को अपने हृदय में रखो॥3॥
---------------------------------------------------------------------------------------------------------
पर उपदेस कुसल बहुतेरे। जे आचरहिं ते नर न घनेरे॥1॥
जब मेघनाद का वध हुआ तो मंदोदरी बहुत प्रकार से पुकार-पुकारकर बड़ा भारी विलाप करने लगी। नगर के सब लोग शोक से व्याकुल हो गए।तब रावण ने सब स्त्रियों को अनेकों प्रकार से समझाया कि समस्त जगत्‌ का यह (दृश्य) रूप नाशवान्‌ है ।रावण ने उनको ज्ञान का उपदेश किया। वह स्वयं तो नीच है, पर उसकी कथा (बातें) शुभ और पवित्र हैं। 
दूसरों को उपदेश देने में तो बहुत लोग निपुण होते हैं। पर ऐसे लोग अधिक नहीं हैं, जो उपदेश के अनुसार आचरण भी करते हैं॥
------------------------------------------------------------------------------------------------------

---------------------------------------------------------------------------------------------------------






Comments

Popular posts from this blog

{0 5 ] QUIZ ON; LAL BAHADUR SHASTRI

101 श्री कृष्ण के प्रिय 28 नाम

{ 81} 9 नवरात्रि माता का भोग