211 - ====== संस्कृत to Hindi सुभाषितानि==========
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षड् दोषाः पुरुषेणेह हातव्या भूतिमिच्छता!
निद्रा तद्रा भयं क्रोधः आलस्यं दीर्घसूत्रता !!
हिन्दी अर्थ : किसी व्यक्ति के बर्बाद होने के 6 लक्षण होते है – नींद, गुस्सा, भय, तन्द्रा, आलस्य और काम को टालने की आदत.
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कलहान्तानि हम्र्याणि कुवाक्यानां च सौहृदम् |
कुराजान्तानि राष्ट्राणि कुकर्मांन्तम् यशो नॄणाम् ||
अर्थ: झगडों से परिवार टूट जाते है | गलत शब्द के प्रयोग करने से दोस्ती टूट जाती है । बुरे शासकों के कारण राष्ट्र का नाश होता है| बुरे काम करने से यश दूर भागता है।
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सा भार्या या प्रियं बू्रते स पुत्रो यत्र निवॄति: ।
तन्मित्रं यत्र विश्वास: स देशो यत्र जीव्यते ॥
अर्थ: जो मीठी वाणी में बोले वही अच्छी पत्नी है, जिससे सुख मिले वह पुत्र, जिस पर विश्वास हो वह मित्र, और जहाँ आजीविका मिले वही देश सबसे अच्छा है ।
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कन्या वरयते रुपं माता वित्तं पिता श्रुतम् बान्धवा: कुलमिच्छन्ति मिष्टान्नमितरेजना:
अर्थ: विवाह के समय कन्या सुन्दर पती चाहती है| उसकी माताजी सधन जमाइ चाहती है। उसके पिताजी ज्ञानी जमाइ चाहते है तथा उसके बन्धु अच्छे परिवार से नाता जोडना चाहते है। परन्तु बाकी सभी लोग केवल अच्छा खाना चाहते है।
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परो अपि हितवान् बन्धुः अहितः परः! अहितः देहजः व्याधिः हितम् आरण्यं औषधम् !!
हिन्दी अर्थ : अगर कोई अपरिचित व्यक्ति आपकी सहायता करे तो उसे अपने परिवार के सदस्य की तरह ही महत्व दें । वहीं, अगर आपका परिवार का व्यक्ति आपको नुकसान पहुंचाए तो उसे महत्व देना बंद कर दें. ठीक उसी तरह जैसे शरीर के किसी अंग में चोट लगने पर हमें तकलीफ पहुँचती है वही जंगल की औषधि हमारे लिए फायदेमंद होती है.
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काक चेष्टा, बको ध्यानं, स्वान निद्रा तथैव च।
अर्थ : अल्पहारी, गृहत्यागी, विद्यार्थी पंच लक्षणं॥ कौवे जैसी कोशिश, बगुले जैसा ध्यान, कुत्ते जैसी नींद, कम खाने वाला और घर का मोह न करने वाला - ये एक विद्यार्थी के पाँच लक्षण हैं।
---------------------------------------------------------------------------------------------------------------दिवसेनैव तत् कुर्याद् येन रात्रौ सुखं वसेत् ।
यावज्जीवं च तत्कुर्याद् येन प्रेत्य सुखं वसेत् ॥पदाहतं सदुत्थाय मूर्धानमधिरोहति ।
स्वस्थादेवाबमानेपि देहिनस्वद्वरं रज: ॥
अर्थ: जो पैरों से कुचलने पर भी उपर उठता है ऐसा मिट्टी का कण अपमान किए जाने पर भी चुप बैठने वाले व्यक्ति से श्रेष्ठ है ।
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न अन्नोदकसमं दानं न तिथिद्र्वादशीसमा ।
न गायत्रया: परो मन्त्रो न मातु: परदैवतम् ॥
अर्थ: अन्नदान जैसे दान नहीं ।
द्वादशी जैसे पवित्र तिथी नहीं।
गायत्री मन्त्र जैसा श्रेष्ठ कोई मंत्र नहीं
तथा माता के समान श्रेष्ठ कोई देवता नहीं ।
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आस्ते भग आसीनस्य ध्र्वम् तिष्ठति तिष्ठत: ।
शेते निषद्यमानस्य चरति चरतो भग: ॥
अर्थ: जो मनुष्य (कुछ काम किए बिना) बैठता है, उसका भाग्य भी बैठता है ।
जो खड़ा रहता है, उसका भाग्य भी खड़ा रहता है ।
जो सोता है उसका भाग्य भी सोता है और जो चलने लगता है, उसका भाग्य भी चलने लगता है ।
अर्थात कर्म से ही भाग्य बदलता है ।
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पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि जलमन्नं सुभाषितम् ।
मूढै: पाषाणखण्डेषु रत्नसंज्ञा प्रदीयते ॥
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