140. दुनिया बनाने वाले ! क्या ख़ूब कहते हो [कविता ]
https://www.youtube.com/watch?v=C8M02QnD3IQ
दुनिया बनाने वाले ! वाह , क्या खूब कहते हो-
मिथ्या यह संसार है मानव !
दुखों का भंडार है मानव
मोह करना इसका क्या-
छोड़ो जी के जंजाल को मानव !
दुनिया बनाने वाले ! वाह , क्या खूब कहते हो-
मिथ्या यह संसार है मानव !
दुखों का भंडार है मानव
मोह करना इसका क्या-
छोड़ो जी के जंजाल को मानव !
[ 1]
क्यूँ रोते हो दुःख में तुम
क्यूँ हंसते हो सुख में तुम
क्यूँ हंसते हो सुख में तुम
क्या लाए थे ?
जिसको अपना कहते हो तुम ?
क्या ले जाओगे ?
मोह जिसका रखते हो तुम ?
जिसको अपना कहते हो तुम ?
क्या ले जाओगे ?
मोह जिसका रखते हो तुम ?
[2]
वाह ! प्रभु वाह ।
अपनी ही बनाई दुनिया में कहते हो
-क्यूँ रहते हो मानव तुम ?
वाह ! प्रभु वाह ।
अपनी ही बनाई दुनिया में कहते हो
-क्यूँ रहते हो मानव तुम ?
[3]
रचते हो अपने मन से
फिर कहते हो मुखारविंद से
[ माया जाल ] है "संसार नहीं ये"
अपनी ही रचना को ख़ुद कहते हो
वास्तविक नहीं , भ्रम-जाल है ये ?
रचते हो अपने मन से
फिर कहते हो मुखारविंद से
[ माया जाल ] है "संसार नहीं ये"
अपनी ही रचना को ख़ुद कहते हो
वास्तविक नहीं , भ्रम-जाल है ये ?
[4]
पृथ्वी पर जीवन देते हो
पालन ख़ुद ही करते हो
बनो हे मानव ! कर्मयोगी
पल अगले संदेश तुम देते हो
पृथ्वी पर जीवन देते हो
पालन ख़ुद ही करते हो
बनो हे मानव ! कर्मयोगी
पल अगले संदेश तुम देते हो
[ 5 ]
सुना है- तुम तो यह भी कहते हो
यहाँ कोई किसी का पुत्र नहीन कोई पत्नी, न कोई पति
सब रिश्ते-नाते हैं बेमायने i
माँ का बच्चे को पालना फिर तो
पिता के द्वारा पोषण फ़िर तो
कह दो जरा- ऐ मालिक
क्या ये सब भी हैं बेमायने ?
[ 6 ]
दुनिया मिथ्या --------------
इसमें रहना मिथ्या=--------
समझा दो ज़रा तुम इसका तथ्या
फिर क्यूं बनाना निरर्थक, आधारहीन को "
कह दो जो न हो सत्या ?
फिर क्यूं बनाना निरर्थक, आधारहीन को "
कह दो जो न हो सत्या ?
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By: Nirupma Garg

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