{7} स्वच्छता अभियान{कविता}
विशाल देश के वासी हो,क्यूँ हो फिर घर तक
सीमित
घर में रहती रोज़ सफाई, देश का आँगन फिर क्यों है विहित?
मान-सम्मान जानो तुम्हारा, इसकी शान में, ही है निहित
[2]
पार्क शरीर के फेफड़े, हर गली तुम्हारी श्वास-नली
चहूँ ओर रखनी होगी स्वच्छता, गर रोग की पीड़ा न हो सहनी
गंदगी होगी गर बाहर, मोहल्ला-मोहल्ला, सड़क-सड़क
वही लौटकर गला पकड़ती, नहीं सुनाती किसी को आहट
[3]
राजा-रंक,गरीब-अमीर, सब का
पी जाती है खून
चीख-पुकार से अस्पताल हैं भरते, ईष्ट-देवों के घंटे बजते
अपराध हुआ जब अपने
हाथों, ईश्वर भी न तब हैं सुनते
[4]
"और देश हैं कितने सुन्दर"- सुनो ये सब कहने वालों
रुपया-पैसा गया तो गया, मान-सम्मान भी चला गया
रुपया-पैसा गया तो गया, मान-सम्मान भी चला गया
सोने जैसे देश को अपने, कूड़े
में तुमने ही रोल दिया
कितने स्वच्छ हैं बाहरी देश, कहने में कुछ हिचक करो
कितने स्वच्छ हैं बाहरी देश, कहने में कुछ हिचक करो
खुद ही गंदा करके तुम, देश को न
बदनाम करो
मिली है तुम्हें अनमोल स्वतंत्रता'
तुमने बदलकर 'स्वच्छन्दता' नाम दे दिया
इसी 'स्वच्छन्दता' ने तो खत्म कर दिया
मूल्य अपनी स्वतंत्रता का
[5]
भूल गए क्या?-
ऋषियों की धरती है यह,
“राम” के पग से पावन हुई
खींच लाई थी जग-पालक को,
“शबरी” द्वारा यही सफाई
गर्व करो ये कथा सुना कर तुम अपने बच्चों को
गर्व करो ये कथा सुना कर तुम अपने बच्चों को
" गंद न करो देश में तुम"
सिखलाओ मन के सच्चों को
[6]
खरा सोना है अपनी स्वतंत्रता
फिर भी तराशना पड़ता है
"खूबसूरत आकार देना" ऐसा
जौहरी को कहना पड़ता है
[8]
गांधी जी की याद में आज करो यह वायदा
अपना "इंडिया शाइन करेगा" लगाओ मिल कर नारा ॥
जय भारत i
==================================================================== लेखिका: निरुपमा गर्ग

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