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246. 26 जनवरी- गणतंत्र दिवस-हिन्दी कविता

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"स्वतंत्रता दिवस" और "गणतंत्र दिवस"  भारत के दो  अनमोल  पर्व   हैं एक है शासन हाथ में देता इसे  चलाने का  दूजा   है अधिकार देता   [ 1 ] Govt. is of the people, by the people, for the people अर्थात-  अपने हितकारी राजा को जनता मर्ज़ी से चुन सकती है हित न चाहने वाले को     उखाड़ जड़ से  सकती है जनता ही राजा,जनता ही प्रजा है उसका ही  फैसला सर्वे सर्वा है वह अ‍ब किसी की  दास नहीं ,   उखाड़ सकता है उसका एक वोट  दु:शासन की  गुलामी   की  उसे  अब  जरूरत नहीं     [ 2 ] न भूले जनता  भी- जैसे राजा के हैं कर्तव्य यहां प्रजा के भी हैं कुछ दायित्व यहां दोनों पालन कर लें गर तो बन जाए स्वर्ग यहां    [3 ] न भूलें  शासक,  न भूले  प्रजा अ‍पने-अपने दायित्वों  को  उद्देश्य यही था बनाने का गणतन्त्र ,  “गणराज्य” भारत को    [4] भूल न जाएं कही बातों को "संविधान पुस्तिका" बनाई गई थी  खो न जाए "बानी" ...

विवाह के समय गाए जाने वाले मांगलिक भजन

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भजन नं 26-सजा दो  पूरा  भारत देश, कैलाश  से  बारात आ रही https://www.youtube.com/watch?v=osvk0IClUeQ ================================================ भजन-हाथ खनकती चूडियां होंं, ब्याहता  सदा  सुहागन हों   link.=https://www.youtube.com/watch?v=s6fYp8xqChQ ======================= ==========================================

श्री रामचरितमानस-उत्तरकाण्ड-सातवां सोपान

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  काकभुसुण्डि एक चिरंजीवी ऋषि हैं जो कौवे के रूप में अमर हो गए, और गरुड़, पक्षियों के राजा, को रामचरितमानस की कथा सुनाते हैं । काकभुसुण्डि को लोमश ऋषि के श्राप के कारण कौवा बनना पड़ा, लेकिन राम मंत्र और इच्छामृत्यु के वरदान से वे अमर हो गए और भगवान राम के परम भक्त बने। गरुड़ के मन में राम के भगवान होने का संदेह था, जिसे काकभुसुण्डि ने रामकथा सुनाकर दूर किया।     प्र.1               *  * प्रथमहिं कहहु नाथ मतिधीरा। सब ते दुर्लभ कवन सरीरा॥ बड़ दुख कवन कवन सुख भारी। सोउ संछेपहिं कहहु बिचारी॥2॥ भावार्थ:- हे नाथ! हे धीर बुद्धि! पहले तो यह बताइए कि सबसे दुर्लभ कौन सा शरीर है फिर सबसे बड़ा दुःख कौन है और सबसे बड़ा सुख कौन है, यह भी विचार कर संक्षेप में ही कहिए॥ काकभुशुण्डिजी ने कहा- हे तात अत्यंत आदर और प्रेम के साथ सुनिए। मैं यह नीति संक्षेप से कहता हूँ॥ *नर तन सम नहिं कवनिउ देही। मनुष्य शरीर के समान कोई शरीर नहीं है। चर-अचर सभी जीव उसकी याचना करते हैं। वह मनुष्य शरीर नरक, स्वर्ग और मोक्ष की सीढ़ी है तथा कल्याणकारी ज्ञान, वैराग्य और...