236. =========श्री रामचरितमानस-सुन्दरकाण्ड शिक्षाएं [ Teachings] Hindi/ English

                                                        
                                                                           सुन्दरकाण्ड

* सचिव बैद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस
राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास॥37॥
भावार्थ:-मंत्री, वैद्य और गुरु- ये तीन 
यदि (अप्रसन्नता के) भय या (लाभ की) आशा से (हित की बात न कहकर) प्रिय बोलते हैं (ठकुर सुहाती कहने लगते हैं), तो 
(क्रमशः) राज्य, शरीर और धर्म- इन तीन का शीघ्र ही नाश हो जाता है, क्योंकि बुद्धिमान मन्त्री डर से राजा को सही सलाह देना छोड देते हैं॥37॥
English: If ministers, doctors, or gurus speak pleasing words out of fear or flattery, the kingdom, righteousness and body are quickly destroyed.
Message: Flattery of a king, ruler, or a Prime Minister leads to destruction because wise men stop giving the right advice.
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* जो आपन चाहै कल्याना। सुजसु सुमति सुभ गति सुख नाना॥
सो परनारि लिलार गोसाईं। तजउ चउथि के चंद कि नाईं॥3॥
भावार्थ:- विभीषण ने रावण से कहा- आप श्रीराम को सीता लौटा दीजिए क्योंकि कहा गया है- जो मनुष्य अपना कल्याण, सुंदर यश, सुबुद्धि, शुभ गति और नाना प्रकार के सुख चाहता हो, वह हे स्वामी! परस्त्री के ललाट को चौथ के चंद्रमा की तरह त्याग दे (अर्थात्‌ जैसे लोग चौथ के चंद्रमा को नहीं देखते, उसी प्रकार परस्त्री का मुख ही न देखे)॥3॥
English: He who desires his own welfare, good reputation, wisdom, virtuous goals, and various pleasures, should abandon another's wife's forehead, just as one avoids the sight of the moon of the fourth day{ चौथ का चांद}
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* चौदह भुवन एक पति होई। भूत द्रोह तिष्टइ नहिं सोई॥
गुन सागर नागर नर जोऊ। अलप लोभ भल कहइ न कोऊ॥4॥
भावार्थ:-चौदहों भुवनों का एक ही स्वामी हो, वह भी जीवों से वैर करके ठहर नहीं सकता (नष्ट हो जाता है) जो मनुष्य गुणों का समुद्र और चतुर हो, उसे चाहे थोड़ा भी लोभ क्यों न हो, तो भी कोई भला नहीं कहता॥4॥
English: "Even if one is the sole master of the fourteen worlds, he cannot sustain themselves by acting as an enemy to living beings." A man who is an ocean of virtues, even if he has a little greed, no one calls him good.
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* काम क्रोध मद लोभ सब नाथ नरक के पंथ।
हे नाथ! काम, क्रोध, मद और लोभ- ये सब नरक के रास्ते हैं, इन सबको छोड़ देना चाहिए।
English: Lust, greed, pride, and anger-these are all paths to hell. So one should abandon them.
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* सुमति कुमति सब कें उर रहहीं। नाथ पुरान निगम अस कहहीं॥
जहाँ सुमति तहँ संपति नाना। जहाँ कुमति तहँ बिपति निदाना॥3॥
भावार्थ:- हे नाथ! पुराण और वेद ऐसा कहते हैं कि सुबुद्धि (अच्छी बुद्धि) और कुबुद्धि (खोटी बुद्धि) सबके हृदय में रहती है, जहाँ सुबुद्धि है, वहाँ नाना प्रकार की संपदाएँ (सुख की स्थिति) रहती हैं और जहाँ कुबुद्धि है वहाँ परिणाम में विपत्ति (दुःख) रहती है॥
English: "Good and evil sense" dwell in every heart. Where there is wisdom, there is prosperity of all kinds; where there is folly, there is inevitable disaster.
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साधु अवग्या तुरत भवानी। कर कल्यान अखिल कै हानी॥1॥
(शिवजी कहते हैं-) हे भवानी! साधु अर्थात भले इंसान का अपमान तुरंत ही संपूर्ण कल्याण की हानि (नाश) कर देता है॥1॥
English: Lord Shiva tells Goddess Parvati that the people who insult the holy men, their accumulated blessings and welfare are immediately destroyed.

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* नाथ दैव कर कवन भरोसा। सोषिअ सिंधु करिअ मन रोसा॥
कादर मन कहुँ एक अधारा। दैव दैव आलसी पुकारा॥2॥
भावार्थ:-(लक्ष्मणजी ने कहा-) हे नाथ! दैव का कौन भरोसा! मन में क्रोध कीजिए (ले आइए) और समुद्र को सुखा डालिए। यह दैव तो कायर के मन का एक आधार (तसल्ली देने का उपाय) है। आलसी लोग ही दैव-दैव पुकारा करते हैं॥2॥
English: Laxmna said to Lord Rama,"What trust can one place in fate? Get angry to Smudra{sea} and dry up soon.Fate is the only support for cowards; only lazy people cry out, "Fate, Fate"
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* बिनय न मानत जलधि जड़ गए तीनि दिन बीति।
बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति॥57॥
भावार्थ:-इधर तीन दिन बीत गए, किंतु जड़ समुद्र विनय नहीं मानता। तब श्री रामजी क्रोध सहित बोले- बिना भय के प्रीति नहीं होती! अर्थात विनम्र होना एकसभ्य संस्कार है लेकिन अगर सामने वाले को अहंकार आ जाए और आपका तिरस्कार करने लगे तो उसे भय दिखाना आवश्यक है ॥57॥
English: Three days passed as the dull witted ocean did not heed the humble request. Then Lord Rama spoke in anger, " True love can not be achieved without fear or discipline.
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