217. श्री रामचरित- सातवां सोपान-उत्तरकाण्ड में दी हुई सटीक बातें
काकभुसुण्डि एक चिरंजीवी ऋषि हैं जो कौवे के रूप में अमर हो गए, और गरुड़, पक्षियों के राजा, को रामचरितमानस की कथा सुनाते हैं । काकभुसुण्डि को लोमश ऋषि के श्राप के कारण कौवा बनना पड़ा, लेकिन राम मंत्र और इच्छामृत्यु के वरदान से वे अमर हो गए और भगवान राम के परम भक्त बने। गरुड़ के मन में राम के भगवान होने का संदेह था, जिसे काकभुसुण्डि ने रामकथा सुनाकर दूर किया। प्र.1 * * प्रथमहिं कहहु नाथ मतिधीरा। सब ते दुर्लभ कवन सरीरा॥ बड़ दुख कवन कवन सुख भारी। सोउ संछेपहिं कहहु बिचारी॥2॥ भावार्थ:- हे नाथ! हे धीर बुद्धि! पहले तो यह बताइए कि सबसे दुर्लभ कौन सा शरीर है फिर सबसे बड़ा दुःख कौन है और सबसे बड़ा सुख कौन है, यह भी विचार कर संक्षेप में ही कहिए॥ काकभुशुण्डिजी ने कहा- हे तात अत्यंत आदर और प्रेम के साथ सुनिए। मैं यह नीति संक्षेप से कहता हूँ॥ *नर तन सम नहिं कवनिउ देही। मनुष्य शरीर के समान कोई शरीर नहीं है। चर-अचर सभी जीव ...