187 अर्थ सहित लघु दुर्गा सप्तशती

 

                                  

अर्थ सहित लघु दुर्गा सप्तशती
विधि- 
               सर्वप्रथम स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। माँ दुर्गा की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें और गाय के घी का दीपक व धूप जलाएं। अपनी मनोकामना का स्मरण करते हुए हाथ में जल या अक्षत लेकर संकल्प लें।
1.प्रतिदिन 9 बार पाठ करना श्रेष्ठ माना गया है । पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें ।एकाग्र मन और श्रद्धा अत्यंत आवश्यक है
2.3=विशेष क्रम पहले दुर्गा कवच,फिर सिद्ध कुंजिका स्तोत्र,उसके बाद लघु दुर्गा सप्तशती का पाठ करना चाहिए ।
२.  लघु सप्तशती का मूल पाठ शुरू करने से पहले देवी कवच, अर्गला स्तोत्र और कीलक स्तोत्र का पाठ करना अपनी  इच्छा माना गया है।
३.  इसके बाद श्री मार्कण्डेय-प्रोक्त लघु दुर्गा सप्तशती (लघु सप्तशती स्तोत्र) का पाठ करें।
४.  पाठ की पूर्णता और शीघ्र फल प्राप्ति के लिए अंत में सिद्ध कुंजिका स्तोत्र का पाठ करें।
5. अंत में  क्षमा प्रार्थना अवश्य करें।
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लघु दुर्गा सप्तशती  पाठ-
1. पहला श्लोक
ॐ वीं वीं वीं वेणु हस्ते स्तुति विधव+टुके हां तथा तान+माता,
स्वानंदे+मंद+रुपे अविहत+निरुते भक्तिदे मुक्तिदे त्वम्।
हंसः सोहं विशाले वलय+गति+हसे सिद्धिदे वाम+मार्गे,
ह्रीं ह्रीं ह्रीं सिद्ध+लोके कष कष विपुले वीरभद्रे नमस्ते।
अर्थ: हे वंशी धारण करने वाली, आनंदमयी, भक्तों को भक्ति और मुक्ति प्रदान करने वाली देवी! आपको नमस्कार है। आप सिद्ध लोक में विराजमान हैं और भक्तों के भय का नाश  करने वाली हैं।
2.ॐ ह्रींकारं चोच्चरन्ती मम+हरतु भयं चर्म+मुण्डे प्रचन्डे खां खां खां खड्ग+पाणे ध्रक+ध्रक+ध्रकिते उग्र+रूपे स्वरूपे |
हुंहुंहुंकार+नादे गगन+भुवि तथा व्यापिनी व्योम+रूपे हं हं हंकार+नादे सुरगण+नमिते राक्षसानां निहंत्री || २ ||

अर्थ: "हे 'चर्ममुण्डा' (खाल का मुकुट पहनने वाली) और प्रचंड रूप वाली माता! आप 'ह्रीं' बीज मंत्र का उच्चारण करने वाली हैं, कृपया मेरे भय को दूर करें। हे खड्ग (तलवार) धारण करने वाली, थर-थर कांपने वाली भयावह और उग्र स्वरूप वाली! आपके 'खां खां खां' की ध्वनि और 'ध्रक-ध्रक' की गर्जना अद्भुत हैं। आकाश से लेकर पृथ्वी तक व्याप्त रहने वाली और व्योम (अंतरिक्ष) का रूप धारण करने वाली माता ! देवताओं द्वारा पूजित और राक्षसों का संहार करने वाली हे माता! आपके 'हुं हुं' और 'हं हं' की हुंकार ध्वनि को मैं नमस्कार करती हूं।

3. ऐं लोके कीर्तयन्ति मम हरतु भयं चण्ड+रुपे नमस्ते घ्रां+घ्रां+घ्रां घोर+रूपे घघ+घघ+घटिते घर्घरे घोर+रावे |
निर्मांसे काकजङ्घे घसित+नख+नखा+धूम्रनेत्रे त्रिनेत्रे हस्ताब्जे शुलमुण्डे कल+कुलकु+कुले श्रीमहेशी नमस्ते || ३ ||
अर्थ: "हे चण्डरूपे (भयानक रूप वाली)! जिन्हें सम्पूर्ण लोकों में कीर्तित (जपा) जाता है, वे माँ मेरे भय को हरें। हे घोर रूप वाली, घ्रां-घ्रां-घ्रां (बीज मंत्र) का उच्चारण करने वाली, घोर गर्जना और भयानक ध्वनि करने वाली आपको नमस्कार है।"
"हे देवी! आपके शरीर पर मांस नहीं है (अर्थात आप कृशकाय हैं), (काकजंघे) अर्थात आपके पैर कौवे के समान हैं, और (धूम्रनेत्र) अर्थात आपके नेत्र धुएँ के समान हैं। आप त्रिनेत्री हैं, जिनके एक हाथ में कमल और दूसरे में शूल-मुण्ड (त्रिशूल और मुंड) सुशोभित हैं, जो कोलाहल और किलिकिल की ध्वनि करती हैं। हे श्रीमहेशी! आपको मेरा प्रणाम स्वीकार हो ।
क्रीं क्रीं क्रीं ऐं कुमारी कुह+कुहम+खिले कोकिले मानु+रागे मुद्रा+संज्ञत्रि+रेखां कुरु कुरु सततं श्रीमहामारी गुह्ये |
तेजोंगे सिद्धिनाथे मनु+पवन+चले नैव आज्ञा निधाने ऐंकारे रात्रिमध्ये शयित+पशु+जने तंत्रकांते नमस्ते || ४ ||
अर्थ: 'क्रीं' (महाकाली का बीजाक्षर) और 'ऐं' (सरस्वती/ज्ञान का बीजाक्षर) मंत्रों से पूजित, कुमारी रूप में स्थित, और समस्त चराचर जगत में कोयल की मधुर ध्वनि की तरह प्रेम और अनुराग बिखेरने वाली देवी को प्रणाम है। हे गुप्त स्वरूप वाली श्री महामारी (विपत्तियों को नष्ट करने वाली) देवी! आप (साधक के शरीर या चक्रों में) मुद्राओं और तीन रेखाओं (त्रिपुंड्र या तंत्र की तीन मुख्य नाड़ियों/रेखाओं) के रहस्य को लगातार जागृत और स्थापित करें। तेजस्वी अंगों वाली, सिद्धियों के स्वामियों (सिद्धिनाथों) को भी संचालित करने वाली, तथा मन और प्राण (पवन) की गति के समान चंचल या सूक्ष्म रूप से चलने वाली देवी, आपकी आज्ञा और विधान अटूट हैं। 'ऐं' कार स्वरूप वाली, आधी रात (महारात्रि) के समय जब अज्ञानी या तामसी लोग (पशुजन) सो रहे होते हैं, तब जागृत रहने वाली तंत्र की अधिष्ठात्री देवी! हे तंत्रकांते, आपको मेरा बारंबार नमस्कार है।

ॐ व्रां व्रीं व्रुं व्रूं कवित्ये दहन+पुरगते रुक्म+रूपेण चक्रे त्रिः शक्त्या युक्त+वर्णादिक+करन+मिते दा+दिवंपूर्ण+वर्णे |
ह्रीं+स्थाने कामराजे ज्वल ज्वल ज्वलिते कोशि+तैस्ता+स्तुपत्रे स्वच्छदं कष्टनाशे सुरवर+वपुषे गुह्य+मुंडे नमस्ते || ५ ||
अर्थ: ॐ व्रां व्रीं व्रुं व्रूं व्रैं: आपके ये आदि शक्ति और महाविद्याओं को जाग्रत करने वाले शक्तिशाली तांत्रिक बीजाक्षर, ऊर्जा तरंगों को सक्रिय करते हैं। वाणी, बुद्धिमत्ता, ज्ञान और उत्तम काव्य-रचना की शक्ति देने वाली देवी को प्रणाम स्वीकार हो। जो अग्नि तत्व के पुर (अर्थात मणिपुर चक्र या मूलाधार की योग-अग्नि) में स्थित हैं, या जो शत्रुओं के नगरों को भस्म करने की शक्ति रखती हैं, उन्हें बार-बार नमस्कार हो। चक्र में जो देवी सुवर्ण के समान दिव्य, देदीप्यमान और चमकीले रूप में प्रकट होती हैं,उन्हें नमस्कार हो। जो तीनों महाशक्तियों (महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती) की ऊर्जा और इच्छा, ज्ञान व क्रिया शक्ति से युक्त हैं। जो तीनों महाशक्तियों (महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती) की ऊर्जा और इच्छा, ज्ञान व क्रिया शक्ति से युक्त हैं, उन्हें नमस्कार। आपको 'वर्ण' अर्थात अक्षर/मंत्र रूपी शक्तियों द्वारा और 'कर' अर्थात हाथों को जोड़कर देवताओं और साधकों द्वारा जिन्हें निरंतर नमन (प्रणाम) किया जाता है। आप आदि वर्णों (सृष्टि के शुरुआती स्वरों और अक्षरों) के माध्यम से देवताओं को भी ऐश्वर्य और दिव्य पद प्रदान करने वाली हैं, हे मां! आपको कोटि-कोटि नमन ।
ॐ घ्रां घ्रीं घ्रूं घोरतुण्डे घघ+घघ+घघघे घर्घ+रान्यांघ्रि+घोषे ह्रीं क्री द्रं द्रौं च चक्र र र र र रमिते सर्वबोध+प्रधाने |
द्रीं तीर्थे द्रीं तज्येष्ठ जुग+जुगज+जुगे म्लेच्छदे कालमुण्डे सर्वाङ्गे रक्त+घोरा+मथन+करवरे वज्रदण्डे नमस्ते || ६ ||
अर्थ: भयंकर मुख या सूंड वाली (उग्र रूप धारण करने वाली) और दिव्य बीजाक्षरों से सुशोभित देवी, आपको प्रणाम है। जिनके पैरों के चलने या घुंघरुओं से 'घर्घरा' जैसी भयानक और गूंजने वाली ध्वनि (नाद) उत्पन्न होती है,उन्हें नमस्कार हो।जो ह्रीं और क्रीं जैसे शक्तिशाली बीजाक्षरों से युक्त हैं और जो ब्रह्मांड के काल-चक्र या सुदर्शन चक्र की तरह गतिमान होकर रमण करती हैं,उन्हें नमस्कार। जो अपने भक्तों को परम ज्ञान, चेतना और बुद्धि प्रदान करने वाली हैं,उन्हें प्रणाम्। जो सभी पवित्र तीर्थों में वास करती हैं, जो सबसे ज्येष्ठ (सर्वोच्च) हैं और युगों-युगों से इस सृष्टि की रक्षा कर रही हैं,उन्हें नमस्कार्।
जो दुष्टों, म्लेच्छों (नकारात्मक प्रवृत्तियों) और काल (समय/मृत्यु) के मुंडों को धारण करने वाली या उनका अंत करने वाली हैं,उन्हें नमस्कार। जिनका संपूर्ण शरीर शत्रुओं के रक्त से सना हुआ है और जो युद्ध भूमि में मथन (शत्रुओं का विनाश) करने में श्रेष्ठ हैं,उन्हें प्रणाम्। वज्र के समान कठोर और अमोघ दंड धारण करने वाली देवी, आपको मेरा बारंबार नमस्कार है।
ॐ क्रां क्रीं क्रूं वामभित्ते गगन+गडगड़े गुह्य+योन्याहि+मुण्डे वज्राङ्गे वज्रहस्ते सुरपति+वरदे मत्त+मातङ्ग+रूढे |
सुतेजे शुद्धदेहे लल+लल+ललिते छेदिते पाशजाले कुण्डल्याकार+रूपे वृष+वृषभ+हरे ऐन्द्रि मातर्नमस्ते || ७ ||
अर्थ: ॐ क्रां क्रीं क्रूं: आपका यह मंत्र ऐन्द्री (इन्द्राणी) के आह्वान और उनकी ऊर्जा को जाग्रत करने वाले शक्तिशाली बीज मंत्र हैं। आप आकाश की तरह विशाल गर्जना करने वाली और शत्रुओं के मार्ग में बाधा (दीवार) खड़ी करने वाली हो,
आप अत्यंत रहस्यमयी शक्तियों को धारण करने वाली और दुष्टों का संहार करने वाली हो, आपका शरीर वज्र के समान सुदृढ़ है और आप हाथ में देवराज इंद्र का अस्त्र 'वज्र' सुशोभित हो, आप देवताओं के राजा (इंद्र) को वरदान देने वाली हो और जो मतवाले (ऐरावत) हाथी पर सवार रहती हो, आप अत्यंत दिव्य तेज से संपन्न हो तथा आपका स्वरूप परम पवित्र
है, आप अत्यंत सुंदर, चंचल और आनंदमयी लीलाएं करने वाली हो,आप अपने भक्तों के सभी सांसारिक बंधनों, मोह-माया और कष्टों के जाल को काट देती हो,आप (कुंडलिनी) शक्ति के रूप में टेढ़े-मेढ़े या कुंडल के आकार में निवास करती हो,
सभी प्रकार के पापों, कष्टों और अज्ञान का हरण करने वाली हो,हे देवराज इंद्र की शक्ति स्वरूप माता ऐन्द्री (इन्द्राणी)! आपको मेरा बारंबार नमस्कार हो।
ॐ हुं हुं हुंकार नादे कष कष वसिनी माँसि वैताल+हस्ते सुं+सिद्धर्षैः सु+सिद्धिर्ढ+ढ+ढ+ढ+ढ+ढ+ढ़ः सर्वभक्षी प्रचन्डी |
जूं सः सौं शांति कर्मे मृत मृत निगडे निःसमे सी समुद्रे देवि त्वं साधकानां भव भय हरणे भद्रकाली नमस्ते || ८ ||
अर्थ:
जिनकी 'हुं'कार (हुं हुं हुं) की भयंकर ध्वनि (नाद) से दुष्ट और तामसिक शक्तियां थर-थर कांपती हैं, जो वैताल (भूत-प्रेतराज) को अपने हाथों में धारण करने वाली या वश में रखने वाली हैं, और सभी प्रकार के बंधनों व दुष्टों का संहार (कष-कष) करने वाली हैं, जिन्हें श्रेष्ठ सिद्धों और ऋषियों द्वारा मंत्र की तांत्रिक ध्वनि 'ढ,'ढ' द्वारा पूजा जाता है, जो साधकों को उच्च कोटि की सिद्धियाँ प्रदान करती हैं,जो अत्यंत उग्र (प्रचंड) रूप वाली हैं और सृष्टि के अंत में सब कुछ भक्षण (समाहित) कर लेने वाली 'सर्वभक्षी' हैं, जिनका महामृत्युंजय और बीज मंत्र 'जूं सः सौं शांति कर्मे --' अशांति को दूर कर जीवन में शांति और कल्याण करता है, जो मृत्यु के बंधन, बेड़ियों और संसार रूपी अगाध समुद्र (भवसागर) के संकटों को नष्ट करने वाली हैं तथा जो अपने साधकों (भक्तों) के संसार के सभी भयों (जन्म-मरण, रोग, शत्रु और अकाल मृत्यु के भय) को हरने वाली हैं,उन सर्वशक्ति माँ भद्रकाली को मेरा बारंबार नमस्कार है।
ॐ देवि त्वं तुर्यहस्ते करधृतपरिघे त्वं वराहस्वरूपे त्वं चेंद्री त्वं कुबेरी त्वमसि च जननी त्वं पुराणी महेन्द्री |
ऐं ह्रीं ह्रीं कारभूते अतलतलतले भूतले स्वर्गमार्गे पाताले शैलभृङ्गे हरिहरभुवने सिद्धिचंडी नमस्ते || ९ ||
अर्थ:
हे देवी! आपके चार हाथ हैं, जिनमें आपने परिघ (एक प्रकार का अस्त्र/गदा) धारण किया हुआ है। आप ही वाराही (वराह रूप), ऐन्द्री (इन्द्र की शक्ति), और कुबेरी (कुबेर की शक्ति) रूप हैं। हे माता! आप ही सनातन महेन्द्री हैं।
आप ही 'ऐं' और 'ह्रीं' स्वरूप (बीज मंत्रों के रूप) हैं। अतल, वितल आदि सातों पाताल लोकों में, भूमंडल (पृथ्वी) पर, स्वर्ग मार्ग में, पाताल में, पर्वतों के शिखरों पर तथा विष्णु और शिव के धामों में आप ही व्याप्त हैं। ऐसी सिद्धिदायिनी ही सिद्धिचंडी आहे! आपको मेरा नमस्कार है।
हँसि त्वं शौंडदुःखं शमितभवभये सर्वविघ्नान्तकार्ये गांगींगूंगैंषडंगे गगनगटितटे सिद्धिदे सिद्धिसाध्ये |
क्रूं क्रूं मुद्रागजांशो गसपवनगते त्र्यक्षरे वै कराले ॐ हीं हूं गां गणेशी गजमुखजननी त्वं गणेशी नमस्ते || १० ||
अर्थ:
हे देवी! आप हंसमुख (प्रसन्न) रहने वाली हैं और अपने भक्तों के गहरे दुखों का नाश करने वाली हैं। आप संसार के जन्म-मरण के भय को शांत करने वाली और सभी प्रकार के विघ्न-बाधाओं का अंत करने वाली हैं। आप 'गां, गीं, गूं, गैं' आदि बीज मंत्रों से युक्त षडंग (छह अंगों वाली) शक्ति हैं। आप आकाश के समान विशाल या उच्च स्थान पर स्थित हैं। आप सभी प्रकार की सिद्धियों को देने वाली हैं और स्वयं सिद्धियों के द्वारा ही सिद्ध (प्राप्त) होने योग्य हैं। आप 'क्रूं क्रूं' बीज मंत्रों के प्रभाव वाली, विशेष मुद्राओं और गज (हाथी) के अंश (तेज/रूप) को धारण करने वाली हैं। आप आकाश और वायु की गति के समान तीव्र और सर्वव्यापी हैं। आप तीन अक्षरों के रूप वाली और दुष्टों के लिए अत्यंत विकराल (भयानक) रूप धारण करने वाली हैं। हे 'ॐ हीं हूं गां' बीज मंत्रों के स्वरूप वाली देवी गणेशी! आप गजमुख (भगवान गणेश) को उत्पन्न करने वाली माता हैं (या स्वयं गजमुख स्वरूप वाली आदि-शक्ति हैं)। हे देवी गणेशी, आपको मेरा बारंबार नमस्कार है।
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लघु दुर्गा सप्तशती का धार्मिक महत्व
दुर्गा सप्तशती का संक्षिप्त रूप मानी जाने वाली लघु दुर्गा सप्तशती अत्यंत शक्तिशाली स्तोत्र है, जिसकी रचना मार्कण्डेय मुनि द्वारा की गई मानी जाती है।
इसका मुख्य महत्व इस प्रकार है।
नवरात्रि में इसका पाठ करने से माँ दुर्गा की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
शत्रु बाधा, ग्रह दोष और नकारात्मक ऊर्जा शांत होती है
साधक को धन, सुख, सुरक्षा और आध्यात्मिक उन्नति मिलती है।
यह पाठ विशेष रूप से उन लोगों के लिए उपयोगी है जो पूरा सप्तशती पाठ नहीं कर पाते है।
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भाग 2
गुप्त नवरात्र
हिंदू पंचांग के अनुसार गुप्त नवरात्रि साल में 2 बार आते हैं एक माघ महीने में और दूसरा आषाढ़ महीने में।
गुप्‍त नवरात्रि में मां भगवती के गुप्त स्वरूप यानी काली माता की गुप्‍त रूप से अराधना की जाती है। 
गुप्त नवरात्रि में देवी मां के नौ रूपों की पूजा नहीं होती बल्कि 10 महाविद्याओं की पूजा की जाती है। ये विद्याए हैं- काली, तारा देवी, त्रिपुर सुंदरी, भुवनेश्वरी, छिन्नमस्ता, त्रिपुर भैरवी, मां धूमावती, बगलामुखी, मातंगी और कमला देवी हैं। मान्यता है कि गुप्त नवरात्रों में देर रात में गुप्त रूप से पूजा की जानी चाहिए और घी का दीपक जलाने के बजाए सरसों के तेल का दीपक जलाना चाहिए।
गुप्त नवरात्र पूजा विधि
-इस व्रत में मां दुर्गा की पूजा देर रात ही की जाती है।
-मूर्ति स्थापना के बाद मां दुर्गा को लाल सिंदूर, लाल चुन्नी चढ़ाई जाती है
- नारियल, केले, सेब, तिल के लडडू, बताशे चढ़ाएं और लाल गुलाब के फूल भी अर्पित करें
- गुप्त नवरात्रि में सरसों के तेल के ही दीपक जलाएं
-ॐ दुं दुर्गायै नमः का जाप करना चाहिए

नोट-कोई  भी  स्त्रोत   पढ़ने  से  पहले विनियोग,  न्यास आदि  अवश्य   पढ़ना  चाहिए 

ॐ क्रीं कालिकायै नमः।  

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                                                      मां  भगवती  का   सिद्ध   कुंजिका  स्त्रोत - सही विधि
     ॐ  अस्य श्री कुन्जिका स्त्रोत्र मंत्रस्य  सदाशिव ऋषि: ।
अनुष्टुपूछंदः ।
श्रीत्रिगुणात्मिका  देवता ।
ॐ ऐं बीजं ।
ॐ ह्रीं शक्ति: ।
ॐ क्लीं कीलकं ।
मम सर्वाभीष्टसिध्यर्थे जपे विनयोग: ।
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वैसे  भगवान शिव के अनुसार कोई भी न्यास करने की आवश्यकता नहीं फिर भी माता के चरणों में प्रेम जाग़ृत हो इसलिए निम्न न्यास किए जा सकते हैं । जब हम बार-बार नमस्कार करके स्त्रोत प्रारम्भ करते हैं तो हमें स्वयं ही माता की भक्ति में रस आने लगता है ।

करन्यास:
 
ऐं अंगुष्ठाभ्यां नमः ।
ह्रीं तर्जनीभ्यां स्वाहा ।
क्लीं मध्यमाभ्यां वषट ।
चामुण्डायै अनामिकाभ्यां हुं ।
विच्चे कनिष्ठिकाभ्यां वौषट ।
ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे करतलकर प्रष्ठाभ्यां फट ।

हृदयादिन्यास:
 
ऐं हृदयाय नमः ।
ह्रीं शिरसे स्वाहा ।
क्लीं शिखायै वषट ।
चामुण्डायै कवचाय हुं ।
विच्चे नेत्रत्रयाय वौषट ।
ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे करतलकरप्रष्ठाभ्यां फट ।

 
मां  भगवती  का   सिद्ध   कुंजिका  स्त्रोत  : सरल  विधि

1.पूर्व  दिशा  में  चौकी  बिछा  कर  उस  पर  लाल  कपडा  बिछाएं ।

2.उस  आसन  पर  देवी  भगवती  का  चित्र  रखें  ।

3.उस  चित्र   के  नीचे  एक  कोरे सफेद  कागज़  पर  " ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे । ॐ ग्लौ हुं क्लीं जूं सः  ज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल   ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा ।।  लिख   कर  रख  दें ।

4.चौकी के बायीं तरफ गाय के घी का एक दीपक जलाने के बाद श्री गणेश जी के प्रतिक रूप में एक बड़ी सुपारी में लाल धागा लपेटकर चावल की ढेरी के आसन पर स्थापित कर आव्हान व पूजन करें, 

5.कुशा के  आसन पर बैठकर 21 दिनों तक 108 बार इस स्त्रोत मंत्र का जप करें ।

6.चाहें  तो  प्रतिदिन 11 पाठ  करें  और  एक  माला  नवार्ण  मन्त्र   करें  ।

सिद्ध कुंजिका स्त्रोत के लाभ-

                         सिद्ध कुंजिका स्त्रोत मंत्र को सिद्ध कर जपने से जीवन में आने वाली सभी बाधाएं और पीडाएं अपने आप दूर होने लगती है, समाज में मान -सम्मान मिलने के साथ घर में घन -लक्ष्मी की वृद्धि होने लगती हैं ।

समय:-जब सूर्य अस्त हो संध्या का समय हो तब इसका पाठ करने से पूर्ण फल और सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती है है । साथ ही कुंजिका स्तोत्र का पाठ मध्य रात्रि में करने से शीघ्र फल की प्राप्ति होती है।

1. रात्रि 9 बजे करें तो अत्युत्तम।
2. रात को 9 से 11.30 बजे तक का समय रखें।

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                                                 अनुष्ठान 

1. संकल्प: सिद्ध कुंजिका पढ़ने से पहले हाथ में अक्षत, पुष्प और जल लेकर संकल्प करें। मन ही मन देवी मां को अपनी इच्छा कहें।
2. जितने पाठ एक साथ ( 1, 2, 3, 5. 7. 11) कर सकें, उसका संकल्प करें। अनुष्ठान के दौरान माला समान रखें। कभी एक कभी दो कभी तीन न रखें।
3. सिद्ध कुंजिका स्तोत्र के अनुष्ठान के दौरान जमीन पर शयन करें। ब्रह्मचर्य का पालन करें।
4. प्रतिदिन अनार का भोग लगाएं। लाल पुष्प देवी भगवती को अर्पित करें।
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1. शुक्ल पक्श  की  प्र्तिपदा  द्वितीया  से  इसे  शुरु  कर  सकते  हैं  । या  किसी  भी  मंगलवार  या शुक्रवार  को शुरु  कर  सकते  हैं  ।

2.समय रात्रि  9  बजे  के  बाद  का हो ।

3. लाल  वस्त्र स्नान  करके  धारण  करें  तथा  आसन  भी  लाल  हो \

4.उत्तर  या  पूर्व  दिशा में  मुख  करके  पूजा  करें  ।

5.साधना  से  पूर्व  गणपति  महाराज  के  एक  मंत्र  की  एक माला करें  ।

6.दांय  हाथ  में जल  और चावल  लेकर अपना  नाम ले कर नौ दिन  51 पाठ  का  संकल्प  करें । और  जल  भूमि  पर  छोड  दें  ।

7.तत्पश्चात हाथ  में  जल  ले कर  विनियोग  का  उच्चारण  करें-

ॐ  अस्य श्री कुन्जिका स्त्रोत्र मंत्रस्य  सदाशिव ऋषि: ।
अनुष्टुपूछंदः ।
श्रीत्रिगुणात्मिका  देवता ।
ॐ ऐं बीजं ।
ॐ ह्रीं शक्ति: ।
ॐ क्लीं कीलकं ।
मम सर्वाभीष्टसिध्यर्थे जपे विनयोग: ।
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नवार्ण  मन्त्र  विनियोग-
नवार्ण मंत्र जाप की विधि -
अथ नवार्ण विधि:- सबसे पहळे शाप मोचन मन्त्र अवश्य करना चाहिए ताकि उच्चारण में त्रुटि के लिए मां भगवती से क्षमा मिल जाए-(पुस्तक पूजा का मन्त्रः- “ॐ नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः। नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्म ताम्।।” (वाराहीतन्त्र तथा चिदम्बरसंहिता))। योनिमुद्रा का प्रदर्शन करके भगवती को प्रणाम करें, फिर मूल नवार्ण मन्त्र से पीठ आदि में आधारशक्ति की स्थापना करके उसके ऊपर पुस्तक को विराजमान करें। इसके बाद शापोद्धार करना चाहिए। इसके अनेक प्रकार हैं। 

‘ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं क्रां क्रीं चण्डिकादेव्यै शापनाशागुग्रहं कुरु कुरु स्वाहा’

इस मंत्र का आदि और अन्त में सात बार जप करें। यह “शापोद्धार मंत्र” कहलाता है। इसके अनन्तर उत्कीलन मन्त्र का जाप किया जाता है। इसका जप आदि और अन्त में इक्कीस-इक्कीस बार होता है। यह मन्त्र इस प्रकार है- ‘ॐ श्रीं क्लीं ह्रीं सप्तशति चण्डिके उत्कीलनं कुरु कुरु स्वाहा।’ इसके जप के पश्चात्‌ आदि और अन्त में सात-सात बार मृतसंजीवनी विद्या का जाप करना चाहिए, जो इस प्रकार है- 
‘ॐ ह्रीं ह्रीं वं वं ऐं ऐं मृतसंजीवनि विद्ये मृतमुत्थापयोत्थापय क्रीं ह्रीं ह्रीं वं स्वाहा।’

मारीचकल्प के अनुसार सप्तशती-शापविमोचन का मन्त्र यह है- 

‘ॐ श्रीं श्रीं क्लीं हूं ॐ ऐं क्षोभय मोहय उत्कीलय उत्कीलय उत्कीलय ठं ठं।’ 

इस मन्त्र का आरंभ में ही एक सौ आठ बार जाप करना चाहिए, पाठ के अन्त में नहीं। अथवा रुद्रयामल महातन्त्र के अंतर्गत दुर्गाकल्प में कहे हुए चण्डिका शाप विमोचन मन्त्र का आरंभ में ही पाठ करना चाहिए। वे मन्त्र इस प्रकार हैं-

ॐ अस्य श्रीचण्डिकाया ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापविमोचनमन्त्रस्य वसिष्ठ-नारदसंवादसामवेदाधिपतिब्रह्माण ऋषयः सर्वैश्वर्यकारिणी श्रीदुर्गा देवता चरित्रत्रयं बीजं ह्री शक्तिः त्रिगुणात्मस्वरूपचण्डिकाशापविमुक्तौ मम संकल्पितकार्यसिद्ध्‌यर्थे जपे विनियोगः। 

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